हरियाणा हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: WSSO कंसल्टेंट्स को मिलेगा समान वेतन, 2016 से एरियर देने का आदेश
Haryana News: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने WSSO के डिस्ट्रिक्ट कंसल्टेंट्स को बड़ी राहत देते हुए उन्हें स्वच्छ भारत मिशन के डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम मैनेजर्स के बराबर वेतन देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने 2016 से एरियर भुगतान भी सुनिश्चित किया है।
Haryana News: हरियाणा सरकार के जल एवं स्वच्छता सहायता संगठन (Water and Sanitation Support Organization - WSSO) में कार्यरत डिस्ट्रिक्ट कंसल्टेंट्स को लंबे समय से चली आ रही वेतन असमानता (Pay Parity) की लड़ाई में बड़ी सफलता मिली है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि समान प्रकृति का कार्य करने वाले कर्मचारियों के साथ वेतन में भेदभाव नहीं किया जा सकता।
जस्टिस संदीप मौदगिल की बेंच ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को निर्देश दिया कि WSSO के डिस्ट्रिक्ट कंसल्टेंट्स को हरियाणा स्टेट स्वच्छ भारत मिशन सोसाइटी (Haryana State Swachh Bharat Mission Society) के डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम मैनेजर्स के समान वेतनमान (Salary Scale) दिया जाए। अदालत ने यह लाभ 1 दिसंबर 2016 से प्रभावी माना है और संबंधित कर्मचारियों को बकाया राशि (Arrears) का भुगतान करने के आदेश भी दिए हैं।
वर्षों पुरानी मांग पर मिली न्यायिक मुहर
यह मामला तब सामने आया जब दीपक कुमार और अन्य डिस्ट्रिक्ट कंसल्टेंट्स ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनकी जिम्मेदारियां और कार्यक्षेत्र कई मामलों में डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम मैनेजर्स के समान हैं फिर भी उन्हें कम वेतन दिया जा रहा है।
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने ऐसे दस्तावेज पेश किए गए जिनसे पता चला कि राज्य सरकार स्वयं भी इस वेतन समानता के प्रस्ताव को पहले स्वीकार कर चुकी थी। अगस्त 2018 में इसे सैद्धांतिक मंजूरी (In-Principle Approval) दी गई थी। इसके बाद फरवरी 2021 और अप्रैल 2022 की बैठकों में भी इस विषय पर सहमति बनी। इतना ही नहीं अगस्त 2022 में वित्त विभाग (Finance Department) ने भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी।
सरकार का तर्क अदालत ने क्यों खारिज किया?
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि दोनों पदों की जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं इसलिए वेतन समानता लागू नहीं की जा सकती। हालांकि कोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड और पूर्व निर्णयों का अध्ययन करने के बाद इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने कहा कि जब सरकार स्वयं कई स्तरों पर इस प्रस्ताव को मंजूरी दे चुकी है तब केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं में देरी (Administrative Delay) का हवाला देकर कर्मचारियों को उनका वैध अधिकार नहीं रोका जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी विभागों के बीच फाइलों के लंबित रहने का नुकसान कर्मचारियों पर नहीं डाला जा सकता।
हजारों संविदा और मिशन आधारित कर्मचारियों के लिए अहम संकेत
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल WSSO कंसल्टेंट्स तक सीमित नहीं है। भविष्य में ऐसे अन्य मामलों में भी यह निर्णय संदर्भ (Reference) के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है जहां कर्मचारी समान कार्य के बावजूद वेतन असमानता का सामना कर रहे हैं।
सरकारी मिशनों, परियोजनाओं और संविदा आधारित नियुक्तियों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे समान कार्य के लिए समान वेतन (Equal Pay for Equal Work) के सिद्धांत को मजबूती मिलती है।
तीन महीने में भुगतान नहीं तो देना होगा ब्याज
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि निर्धारित अवधि के भीतर एरियर और वेतन अंतर का भुगतान किया जाए। यदि तीन महीने के भीतर राशि का भुगतान नहीं किया जाता है तो सरकार को संबंधित कर्मचारियों को 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज (Annual Interest) भी देना होगा।
इस फैसले से उन कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है जो पिछले कई वर्षों से अपने वेतन संबंधी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे।
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